बिहार के भोजपुर जिले में 17 जून को हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। घटना के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस मामले पर तीखी बहस छिड़ गई है। बढ़ते विवाद और अलग-अलग दावों के बीच बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने का आदेश दिया है।
एक तरफ पुलिस का कहना है कि भरत तिवारी ने पुलिस टीम पर फायरिंग की थी और आत्मरक्षा में कार्रवाई करनी पड़ी, वहीं दूसरी ओर परिवार और कुछ प्रत्यक्षदर्शी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने पहले ही हथियार डाल दिया था। यही विरोधाभास अब इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
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कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
मामले की शुरुआत 15 जून 2026 को हुई, जब भरत तिवारी ने अपने फेसबुक अकाउंट पर कई पोस्ट साझा किए। इन पोस्टों में उन्होंने कथित तौर पर प्रशासन और अधिकारियों के खिलाफ तीखी टिप्पणियां कीं। कुछ पोस्ट में उन्होंने “क्रांतिकारी युद्ध” शुरू करने की बात कही और जगदीशपुर के एसडीएम को लेकर भी विवादित टिप्पणियां कीं।
पुलिस के अनुसार, उसी दिन उन्हें तलाशने के लिए उनके घर पर दो बार टीम भेजी गई, लेकिन वे नहीं मिले। अगले दिन शाहपुर थाना पुलिस को सूचना मिली कि एक व्यक्ति हथियार के साथ घूम रहा है। जांच में उसकी पहचान बिलौती गांव निवासी भरत भूषण तिवारी के रूप में हुई।
इसी दौरान सोशल मीडिया पर उनकी कुछ तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए, जिनमें वे हथियार के साथ दिखाई दे रहे थे।
फेसबुक लाइव के जरिए लगातार करते रहे दावे
16 और 17 जून के बीच भरत तिवारी ने कई बार फेसबुक लाइव किया। इन वीडियो में उन्होंने दावा किया कि प्रशासन उन्हें फर्जी एनकाउंटर में मारने की तैयारी कर रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित करने की कोशिश की जा रही है।
एक वीडियो में वे पुलिस अधिकारियों से बातचीत करते दिखाई दिए, जबकि दूसरे वीडियो में उन्होंने खुद की तुलना शहीद भगत सिंह से की। वीडियो के दौरान उन्होंने प्रशासन और पुलिस के खिलाफ तीखी बातें कहीं।
भोजपुर पुलिस ने भी सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा था कि भरत मानसिक रूप से परेशान लग रहे थे और उन्हें इलाज के लिए भेजने की प्रक्रिया की जा रही थी। साथ ही उनके पास मौजूद हथियार को सुरक्षित रूप से बरामद करने का प्रयास भी जारी था।
When police appealed to him to surrender, Bharat replied that there would be a “war” and said either he or the police would survive. A gunshot can also be heard in the video as he fired at police personnel.
फायरिंग और एनकाउंटर की कहानी
17 जून की सुबह घटनाक्रम तेजी से बदला। फेसबुक लाइव के दौरान भरत तिवारी पुलिस कर्मियों को खुली चुनौती देते नजर आए। वीडियो में उन्हें हथियार लहराते और पुलिस को पीछे हटने के लिए कहते हुए देखा गया।
पुलिस का कहना है कि उन्होंने कई बार आत्मसमर्पण करने की अपील की, लेकिन भरत ने इसे अस्वीकार कर दिया। अधिकारियों के मुताबिक जब पुलिस उनके करीब पहुंची तो उन्होंने गोली चला दी, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी।
पुलिस के अनुसार इस कार्रवाई में भरत तिवारी के पैर में गोली लगी। बाद में उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) में उनकी मौत हो गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के दावों ने बढ़ाया विवाद
घटना के बाद कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के बयान सामने आए, जिन्होंने पुलिस के आधिकारिक संस्करण पर सवाल खड़े किए।
स्थानीय लोगों का दावा है कि भरत तिवारी ने पुलिस के सामने अपना हथियार फेंक दिया था और इसके बाद उन्हें पकड़ लिया गया था। कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें दूसरी जगह ले जाकर गोली मारी गई।
हालांकि इन दावों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यही वजह है कि घटना को लेकर सवाल लगातार बढ़ते जा रहे हैं और न्यायिक जांच की मांग तेज हो गई।
मौत के बाद प्रदर्शन और हिंसा
18 जून को भरत तिवारी की मौत के बाद गांव में तनाव बढ़ गया। बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय राजमार्ग NH-922 को जाम कर दिया।
स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस घटना के बाद दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं।
एक एफआईआर में भरत तिवारी के पिता काशीनाथ तिवारी और भाई चंदन तिवारी का नाम शामिल किया गया है। दूसरी एफआईआर सड़क जाम और प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को लेकर दर्ज की गई, जिसमें कई नामजद और अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है।
परिवार ने उठाए गंभीर सवाल
भरत तिवारी की मां सुमन देवी ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनके बेटे ने आत्मसमर्पण कर दिया था और उसके बावजूद उसे गोली मारी गई।
परिवार ने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने की मांग की है। दूसरी ओर पुलिस अपने बयान पर कायम है कि कार्रवाई पूरी तरह कानून के दायरे में की गई।
राजनीतिक मुद्दा बना मामला
एनकाउंटर के बाद यह मामला बिहार की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया। कई राजनीतिक दलों के नेता भरत तिवारी के परिवार से मिलने पहुंचे।
राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने घटना को कथित फर्जी एनकाउंटर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की। वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ नेताओं ने भी पूरे मामले की गहन जांच कराने की बात कही।
बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच शाहपुर थाना प्रभारी समेत कई पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया।
कौन थे भरत तिवारी?
भरत तिवारी को लेकर लोगों की राय दो हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है।
एक पक्ष का कहना है कि वे लगातार सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आक्रामक भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे और सोशल मीडिया पर हिंसक बयान दे रहे थे। उनके कई पोस्ट प्रशासन और सरकार की आलोचना से जुड़े हुए थे।
दूसरी ओर बिलौती गांव और आसपास के कई ग्रामीण उन्हें स्थानीय समस्याओं को उठाने वाला व्यक्ति बताते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे सड़क, बिजली, पीने के पानी और विस्थापित परिवारों के मुद्दों को लेकर प्रशासन के सामने आवाज उठाते थे।
इसी कारण कुछ लोग उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं, जबकि कुछ लोग उनके बयानों और गतिविधियों को कानून व्यवस्था के लिए खतरा बताते हैं।
अब न्यायिक जांच पर टिकी निगाहें
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा न्यायिक जांच के आदेश दिए जाने के बाद अब सभी की नजरें जांच प्रक्रिया पर टिकी हैं। यह जांच एक सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश की निगरानी में कराई जाएगी।
जांच में यह स्पष्ट करने की कोशिश होगी कि 17 जून को वास्तव में क्या हुआ था, क्या पुलिस ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया था, और क्या भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण किया था या नहीं।
फिलहाल यह मामला बिहार की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो चुका है और न्यायिक जांच की रिपोर्ट आने के बाद ही कई सवालों के जवाब मिल सकेंगे।

