क्या नेपाल जैसे आंदोलन भारत में भी हो सकती है शुरू।राहुल ने मोदी–शाह को दी तगड़ा अल्टीमेटम। बड़े–बड़े नेताओं ने दी चेतावनी जाने पूरी खबर
हाल के दिनों में नेपाल में जिस प्रकार का जनांदोलन देखने को मिला, उसने पड़ोसी देशों में भी राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है। जनता के बीच असंतोष, बेरोजगारी, महंगाई और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव जैसी स्थितियों ने वहाँ के माहौल को गरमा दिया। अब यही चर्चा भारत में भी जोर पकड़ने लगी है कि क्या यहाँ भी नेपाल जैसी लहर उठ सकती है?
राहुल गांधी का अल्टीमेटम
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को सीधा अल्टीमेटम देते हुए कहा कि देश की जनता अब और चुप नहीं बैठेगी। राहुल ने आरोप लगाया कि सरकार ने संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया है, विपक्षी नेताओं को निशाना बनाया है और बेरोजगारी को काबू करने में पूरी तरह विफल रही है। उन्होंने कहा, “अगर हालात नहीं सुधरे तो जनता खुद अपनी आवाज़ बुलंद करेगी।”
राहुल गांधी के इस बयान को विपक्षी दलों ने खुलकर समर्थन दिया है। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और वामपंथी दलों के नेताओं ने चेतावनी दी है कि सरकार अगर अहंकार छोड़कर संवाद की राह नहीं अपनाती तो देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन खड़ा हो सकता है। कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि महंगाई और बेरोजगारी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, और किसानों–युवाओं की नाराजगी अब सड़कों पर दिखने लगी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में नेपाल जैसी स्थिति बिल्कुल वैसी तो नहीं होगी, क्योंकि यहाँ लोकतंत्र की जड़ें गहरी हैं और विरोध की आवाज़ें संसद से लेकर सड़क तक कई मंचों पर मिलती हैं। लेकिन यह भी सच है कि जब असंतोष बढ़ता है और जनता को लगता है कि उसकी सुनवाई नहीं हो रही, तो आंदोलन स्वतः आकार लेने लगते हैं। किसान आंदोलन इसका ताजा उदाहरण है, जिसने न केवल सरकार को झुकने पर मजबूर किया बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा बटोरी।
नेपाल जैसे बढ़ता बेरोजगारी से भारतीय युवाओं में आक्रोश
नेपाल में हाल ही में हुए जनआंदोलन का सबसे बड़ा कारण था बेरोजगारी और अवसरों की कमी। यही समस्या अब भारत में भी तेजी से उभरती दिखाई दे रही है। आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी लाखों युवा नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में लंबी देरी, भर्तियों में अनियमितता और निजी क्षेत्र में सीमित अवसरों ने युवाओं की नाराजगी को और गहरा कर दिया है।
भारत की आबादी में युवाओं का हिस्सा सबसे बड़ा है, जिसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है। लेकिन जब इस ऊर्जा को सही दिशा नहीं मिलती, तो यही ताकत आक्रोश और असंतोष में बदल जाती है। हाल के महीनों में सोशल मीडिया पर #EmploymentForYouth और #JobsCrisis जैसे हैशटैग बार-बार ट्रेंड करते रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि बेरोजगारी अब केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।
विपक्षी दल लगातार सरकार पर हमलावर हैं। राहुल गांधी ने बेरोजगारी को “युवा पीढ़ी के साथ सबसे बड़ा अन्याय” बताया और कहा कि सरकार नए अवसर पैदा करने में विफल रही है। समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और वामपंथी नेताओं ने भी चेतावनी दी है कि अगर बेरोजगारी पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भारत में भी नेपाल जैसे आंदोलन की जमीन तैयार हो सकती है।
रिपोर्ट अनुसार बेरोज़गारी दर
1. युवा बेरोज़गारी दर (15-29 वर्ष पीढ़ी) 2023-24
– भारत की Periodic Labour Force Survey (PLFS) की रिपोर्ट के मुताबिक, 15-29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में सामान्य स्थिति (Usual Status) में बेरोज़गारी दर वाल्यू ≈ 10.2% है।
2. युवा बेरोज़गारी दर (15-24 वर्ष आयु)
– विश्व बैंक / World Development Indicators के डेटा मुताबिक, भारत में 15-24 वर्ष आयु वर्ग में युवाओं की बेरोज़गारी दर लगभग 16.0-16.5% के आसपास है।
3. सार्वजनिक (पूरे श्रमबल में) बेरोज़गारी दर (15 वर्ष से ऊपर)
– जुलाई 2025 में, सरकारी आँकड़ों के अनुसार भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र वालों की बेरोज़गारी दर लगभग 5.2% रही।
4. युवा-शहर व्याप्ति (Urban Youth) की बेरोज़गारी
– उसी रिपोर्ट में बताया गया है कि शहरी युवाओं (15-29 वर्ष आयु) में बेरोज़गारी दर बढ़ कर लगभग 19.0% हो गई है।
कुल मिलाकर फिलहाल स्थिति यही है कि राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। राहुल गांधी का अल्टीमेटम और विपक्षी दलों की साझा चेतावनी इस बात का संकेत है कि आने वाले महीनों में सड़क पर बड़े प्रदर्शन देखने को मिल सकते हैं। भारत की जनता आंदोलनों की परंपरा से अपरिचित नहीं है, और जब-जब उन्होंने आवाज उठाई है, सत्ता के गलियारों तक उसका असर जरूर पहुँचा है।
अगर सरकार संवाद और ठोस कदमों के जरिए असंतोष को शांत करने में सफल नहीं होती, तो नेपाल जैसी हलचल भारत में भी एक नया अध्याय लिख सकती है। हालांकि, यह तय होगा कि लोकतंत्र की कसौटी पर कौन टिकता है—जनता की आवाज़ या सत्ता का अहंकार।
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