Siwan: शांति के बीच दिखा विकराल रूप, हथियारों संग निकला Mouniya Baba का जुलूस

By himanshu gupta

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Siwan में Mouniya baba का जुलूस

Siwan में Mouniya baba का जुलूस हुआ शांति तरीके से सम्पन्न। लोगों का दिखा विकराल रूप जिसमें लाठी, डंडा, भाला और तलवार के साथ दिखे लोग। जाने पूरी खबर

बिहार के Siwan जिले में धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा Mouniya baba का ऐतिहासिक जुलूस इस वर्ष भी पूरे उत्साह और भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। यह जुलूस हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है और स्थानीय समाज में विशेष महत्व रखता है।

शस्त्रों के साथ दिखा पारंपरिक प्रदर्शन

शस्त्रों के साथ दिखा पारंपरिक प्रदर्शन

Mouniya baba के भव्य जुलूस में हजारों की भीड़ उमड़ी, जिसमें लोगों का आस्था और उत्साह चरम पर दिखाई दिया। जुलूस में शामिल युवाओं और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक तरीके से लाठी, डंडा, भाला और तलवार जैसे शस्त्रों के साथ अपनी भागीदारी दर्ज कराई। हालांकि दृश्य कई बार विकराल रूप धारण करता दिखाई दिया, लेकिन उल्लेखनीय बात यह रही कि पूरे आयोजन के दौरान शांति और अनुशासन बना रहा। जिससे शांतिपूर्ण तरीके से सब सम्पन्न हुआ।

प्रशासन की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था

जुलूस को शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के लिए प्रशासन ने पहले से ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। जगह-जगह Siwan पुलिस बल की तैनाती की गई थी ताकि भीड़ को नियंत्रित रखा जा सके और किसी प्रकार की अप्रिय घटना न हो। जुलूस के मार्ग पर अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों की सतर्कता के कारण कार्यक्रम बिना किसी बाधा के सम्पन्न हुआ।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

  • Mouniya baba का जुलूस सिवान की आस्था, परंपरा और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि समाज में एकता और भाईचारे का संदेश भी देता है।
  • स्थानीय मान्यता के अनुसार, Mouniya baba शक्ति और शौर्य के प्रतीक माने जाते हैं। इसी कारण जुलूस में लाठी, डंडा, भाला और तलवार जैसे शस्त्रों का प्रदर्शन किया जाता है। यह शस्त्र प्रदर्शन न केवल वीरता की परंपरा को जीवित रखता है, बल्कि युवाओं में साहस और आत्मविश्वास का संचार भी करता है।
  • सांस्कृतिक दृष्टि से यह जुलूस पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही लोक परंपरा का हिस्सा है। इसमें भाग लेने वाले लोग अपनी आस्था, श्रद्धा और सामुदायिक सहयोग की भावना को प्रकट करते हैं। ग्रामीण संस्कृति, लोक गीत, नारों और उत्साह से यह आयोजन जीवंत हो उठता है।
  • धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक रंगों के संगम ने मौनिया बाबा के जुलूस को सिवान की सामाजिक धरोहर बना दिया है। यह न सिर्फ श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र है, बल्कि समाज को शांति, एकता और साहस का मार्ग भी दिखाता है।

Mouniya baba का इतिहास

Mouniya baba, जिन्हें “गौ रक्षक सिद्ध संत” के रूप में पूजा जाता है, का समाधि स्थल सिवान (महाराजगंज) में स्थित है। 1923 में संत मौनिया बाबा ने यहाँ जिंदा समाधि ली थी, और इसी से शुरू हुआ यह धार्मिक स्थल आज एक प्रतिष्ठित मेले का केंद्र बन चुका है।

मेले की शुरुआत और उद्देश्य

मेला 1923 में नागा समाज से जुड़े महंत महादेव दास जी महाराज और स्वामी कृपालानंद जी महाराज के नेतृत्व में शुरू हुआ। उद्देश्य था—गौ रक्षा और सामाजिक एकता की भावना जगाना, विशेषकर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गुलामी के दौर में लोगों को एकजुट करना।

अखाड़ों की सहभागिता और आयोजन का स्वरूप

मेले में लगभग 21 (कुछ रिपोर्ट के अनुसार 25 या 32) महावीरी अखाड़ों की सहभागिता होती है, जिनमें शहर और आसपास के गांव—जैसे बंगरा, पसनौली, रुकुंदीपुर, नवलपुर, रामापाली आदि—शामिल हैं। ये अखाड़े लाल-हरी झांकियाँ, कलाबाजियाँ और पारंपरिक प्रदर्शन के साथ आते हैं, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

 Mouniya baba मेलों का सामाजिक–आर्थिक पहलू

मेला लकड़ी व लोहे के सामानों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध है—जैसे आलमारी, संदूक, ओखल-मूसल इत्यादि। साथ ही पेड़-पौधों की नर्सरी, कोलकाता, हाजीपुर, मुजफ्फरपुर जैसे शहरों के व्यापारी अपनी दुकानें लगाते हैं। फैमिली मनोरंजन का उल्लेखनीय हिस्सा हैं—झूला, सर्कस, “मौत का कुआं”, ब्रेक डांस, ड्रैगन शो, मीना बाजार आदि आकर्षण होते हैं।

राजकीय दर्जा का मार्ग

यह मेला 100 से अधिक वर्षों तक राजकीय दर्जा प्राप्त नहीं कर पाया था, जिससे स्थानीय लोगों में निराशा और मांग बनी रही। फिर, जनवरी 2025 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे राजकीय मेला घोषित करने की घोषणा की, और कैबिनेट ने मंजूरी दी—अब यह न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि पर्यटन और स्थानीय विकास के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बन गया है।

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हिमांशु गुप्ता | प्रोफेशनल कंटेंट राइटर एवं डिजिटल जनरलिस्ट रचनात्मक लेखन और डिजिटल रणनीति में निपुण, ब्रांड्स और व्यक्तियों को प्रभावशाली कंटेंट व डिजिटल पहचान बनाने में मददगार।

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