Bihar के सिवान जिले में चर्चित लाली यादव को सिर में गोली मारकर हत्या। मौके पर पहुंचे ओसामा और बड़े–बड़े नेता हुआ बड़ा बवाल जाने पूरी खबर
बिहार के सिवान जिले में रविवार रात को उस समय सनसनी फैल गई जब इलाके के चर्चित व्यक्ति लाली यादव की सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। वारदात ने पूरे जिले ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति को भी हिला कर रख दिया है। घटना की खबर मिलते ही सैकड़ों की संख्या में लोग मौके पर जुट गए। स्थानीय पुलिस बल ने भीड़ को नियंत्रित करने और हालात को काबू में करने के लिए कड़ी मशक्कत की।
गोली मारकर हत्या की घटना
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, लाली यादव अपने कुछ समर्थकों के साथ क्षेत्र में मौजूद थे। तभी अज्ञात हमलावरों ने पास आकर उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। गोली सीधे उनके सिर में लगी और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। अचानक हुई इस वारदात से आसपास अफरा–तफरी मच गई। बताया जा रहा है कि हमलावर गोलीबारी के बाद आसानी से फरार हो गए।
नेताओं का जमावड़ा
सिवान में लाली यादव की हत्या के बाद नेताओं का मौके पर पहुँचना और उसके बाद पैदा हुआ बड़ा राजनीतिक बवाल एक बार फिर यही साबित करता है कि बिहार की राजनीति में अपराध की घटनाएँ अक्सर जनहित से ज़्यादा राजनीतिक समीकरणों का अखाड़ा बन जाती हैं।
मौके पर बड़े–बड़े नेताओं का जमावड़ा इस बात को साफ़ दर्शाता है कि सिवान की ज़मीन अब भी राजनीति और अपराध के गहरे संबंधों से जकड़ी हुई है। आम जनता का गुस्सा और आक्रोश अपराधियों के खिलाफ है, लेकिन नेताओं की मौजूदगी ने इस हत्या को तुरंत राजनीतिक रंग दे दिया।
जहाँ एक ओर जनता न्याय और सुरक्षा की उम्मीद कर रही है, वहीं नेताओं की भीड़बाज़ी अधिकतर शक्ति-प्रदर्शन और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई जैसी प्रतीत होती है। ऐसी घटनाओं पर संवेदना जताना और प्रशासन पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जब यह शोकसभा से अधिक राजनीतिक मंच बन जाता है, तो पीड़ित परिवार और जनता की असली समस्या हाशिये पर चली जाती है।
सीधे शब्दों में कहें तो, बड़े नेताओं का मौके पर आना अपराध के खिलाफ सख़्त कदम उठवाने के बजाय, राजनीतिक लाभ और अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास ज़्यादा लगता है। यही कारण है कि लोग अक्सर सवाल उठाते हैं – नेताओं का जमावड़ा अपराध घटाने में मदद करता है या केवल राजनीति गरमाने का साधन बनता है?
सिवान: पुलिस की कार्रवाई
सिवान गोलीकांड के बाद पुलिस की कार्रवाई पर अगर नज़र डालें, तो यह साफ़ झलकता है कि प्रशासन हर बार की तरह “जाँच जारी है” और “जल्द गिरफ्तारी होगी” जैसे बयानों तक ही सीमित नज़र आता है। घटनास्थल पर पहुंचकर साक्ष्य जुटाना और बयान देना जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि अपराधी बेख़ौफ़ होकर वारदात को अंजाम कैसे दे जाते हैं और हर बार पुलिस घटना के बाद ही सक्रिय क्यों होती है?
स्थानीय लोगों का गुस्सा इसीलिए है, क्योंकि पुलिस की भूमिका अक्सर प्रतिक्रिया तक सीमित रह जाती है, जबकि रोकथाम और अपराधियों पर पहले से नकेल कसने में नाकामी साफ़ दिखती है।
अगर पुलिस सचमुच गंभीर है, तो महज़ सीसीटीवी खंगालने और धर-पकड़ की औपचारिकता से आगे बढ़कर उसे चाहिए कि क्षेत्र में अपराधियों के नेटवर्क को जड़ से खत्म करे। वरना, जनता के बीच यह धारणा और मजबूत होगी कि पुलिस की कार्रवाई सिर्फ़ कागज़ी आश्वासन है, जबकि अपराधियों के हौसले दिन-ब-दिन बुलंद होते जा रहे हैं।
लोगों में दहशत सरकार से की मांग
सिवान में लाली यादव की हत्या कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि यह उस गहरे संकट की झलक है जिसमें कानून-व्यवस्था और राजनीति दोनों फंसे हुए हैं। वारदात के बाद नेताओं का जमावड़ा और राजनीतिक बयानबाज़ी भले ही सुर्खियाँ बटोरती हो, लेकिन जनता के लिए असली सवाल यही है कि अपराध कब थमेगा और न्याय कब मिलेगा।
पुलिस हर बार की तरह आश्वासन देती है, मगर रोकथाम और अपराध पर लगाम कसने में उसकी नाकामी साफ़ झलकती है। अगर प्रशासन सख़्त कार्रवाई नहीं करता, तो अपराधियों के हौसले और बुलंद होंगे और जनता का भरोसा और गिरता जाएगा।
यह समय है कि सरकार और पुलिस दोनों दिखावे से आगे बढ़कर ठोस और निर्णायक कदम उठाएँ। तभी सिवान की पहचान अपराध और राजनीति के गठजोड़ से निकलकर शांति और विकास की राह पर लौट सकेगी।
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